‘बच्चों को होना सिखाओ, दिखना/दिखाना नहीं’
महिलाओं द्वारा की गयी इस टिप्पणी ने ’शिक्षा की गुणवत्ता’ की धारणा का गहराई से परीक्षण करने और उसे समझने की एक विशिष्ठ यात्रा का सूत्रपात सिद्ध में किया।
शुरूआत

पवन गुप्ता और अनुराधा जोशी, मूलतः विपश्यना, बौध दर्शन और कालयुंग के मनोविज्ञान से प्रेरित होकर और किसी पर्वतीय क्षेत्र में अपना शेष जीवन यापन करने के उद्देश्य से सन् 1989 की शुरुआत में मसूरी आये। आधुनिक शिक्षा से शिक्षित और कलकत्ता व अन्य बड़े शहरों के अनुभव से संपन्न इस दंपत्ति की यह मान्यता थी कि सतत विकास के लिए आधुनिक शिक्षा महत्वपूर्ण है।
नया दौर

2000 में उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ उसके बाद बड़ी तेजी गाँव-गाँव में सरकारी स्कूल प्रारम्भ हुए। उन गाँव में भी जहाँ सिद्ध के प्राथमिक स्कूल चल रहे थे। दानदाता संस्थाओं के प्रति सिद्ध का बदलता दृष्टिकोण व गाँवों में खुल रहे सरकारी स्कूलों के चलते वर्ष तक सिद्ध ने अपने लगभग सभी स्कूल व बालवाड़ियाँ स्थगित कर दी। इसके उपरान्त सिद्ध ने अपने एक नये दौर में प्रवेश किया।
संवाद

‘सिद्ध’ पिछले 3-4 वर्षों से अपने मित्रों के साथ ‘भारतीयता’ और ‘आधुनिकता के द्वन्द्ध’ को समझने के लिए आवसीय परिसंवाद शिविर का आयोजन करता आ रहा है। आमतौर पर इन शिविरों में हम गहनता से विमर्श करते हैं। हमारे प्रतिभागियों में वे माता-पिता और युवा शामिल हैं जो जीवन में अर्थ खोज रहे हैं। प्रयास यह रहता है अपने अनुभवों को गहराई से देखते हुए विषय को समझने का प्रयास किया जाए।
सिद्ध का वीडियो ब्लॉग

SIDH को समर्पित एक चैनल। इस चैनल पर सभी शैक्षिक सामग्री और भाषण प्रसारित किए जाएंगे।
सिद्ध का ब्लॉग पोस्ट

यह एक ब्लॉग पोस्ट है जहाँ आप विभिन्न विषयों पर SIDH के दृष्टिकोण और व्याख्या को देख और पढ़ सकते हैं।
सिद्ध के प्रकाशन

SIDH शुरुआत से ही बिभिन्न प्रकार के प्रकाशन करता रहा है , ओर साथ ही अन्य प्रकाशकों ( जो की सिद्ध की विचार धारा के अनुरूप हैं ) की पुस्तकों को अपने से प्रसारित करता रहा है। कुछ पूर्व के प्रकाशन जो की अब out of stock हैं उनकी Digital Copy (PDF) भी उपलब्ध है ।